Sunday, 15 August 2010

जाग..!!


जाग ज़ग के नव युव
जीवन बिता जा रहा है
तू कहाँ खोया है ---
अभी भी तू मंजिल खोज रहा है ...
अब रास्ते बना -- उस पथ पर --
एक दिशा में चलता जा
मंजिल करीब आएगी..!!!
अब न जागा तो कब जागेगा --
बचपन बीता बचपने में
बुढ़ापा आएगा तो आता ही जायेगा
जवानी भी क्या- यूँ ही सो कर बिताएगा
जन्म लिया है इसे सार्थक कर
मोह-माया से स्वयं को पृथक कर
जवानी महबूब की बाहों में व्यर्थ न कर
जवानी तो जोश है ---
उठ और अपनी मंजिल की ओर बढ़..!!
देख -- सारा ज़ग तुम्हें बुला रहा है
तू कहाँ भटक रहा है
जाग ज़ग के नव युव...
जीवन बीता जा रहा है...!!!!
----------*----------

2 comments:

  1. Waah waah, mast!

    aap to azadi ke pahle wale kavi ho gaye hai!

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  2. Kyunki dost Gulaami abhi bhi hai desh me...
    Angrejon ki soch ki gulaami..

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