Saturday, 31 December 2011

"नया साल..!!"



शाम फिर आज खाली खाली सी है
तन्हाई ने फिर
तनहा रहने की तरकीब निकाली है
दूर डूब रहा है सूरज
साथ में पुराने सारे पल 
अब नयी किरण आएगी 
नए साल के साथ 
सब कुछ नया होगा उस पल में 
नया साल होगा और पुराना मैं 
वक़्त कहता है टूट जाऊंगा मैं
पर जोड़ के खुद को खुद से
फिर से वापस आऊंगा मैं 
नयी किरण की ताजगी होगी
और फिर से मुस्कुराऊंगा मैं
कि नए साल में 
फिर नया होकर आऊंगा मैं 
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Friday, 16 December 2011

"तुम..!!"

तुम अब यूँ 
खामोश न रहा करो कि 
मेरी तन्हाइयों को कहीं 
तेरी खामोशियों से 
इश्क न हो जाये

खामखा आईने में देखकर
खुद पर इतराती हो
ये तो तेरे हर वज़ूद को
झुठला देती है
मेरे बिना तो तुम
खुद को संवार भी
नहीं पाती हो

ये कैसी मझधार है
कि खुद के अक्स से ही
जूझ रहा हूँ मैं
एक तिनके की आस में
बस तेरी ही राह
ओट रहा हूँ मैं...

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Monday, 10 October 2011

"जिद्द..!!"



एक दिन चला जाऊंगा मैं चुपके से...
पीछे छोड़ कर सभी को इस दुनिया से,
रूठना - मनाना सब रह जायेगा अधुरा... 
कि बस मेरा शरीर रहेगा जलाने के लिए | 

गरम शरद की बात ही क्या...
एक दिन तो जलना है चिता पर मुझे,
आग की लपटों से ऊँचा जाना है मुझे,
उठते धुएं से भी दूर निकलना है मुझे |

कर ले जितनी जिद्द करनी है तुझे...
मैं तो हर पल ही मुस्कुराऊंगा...
मना ले मुझे कि अभी भी वक़्त है तेरे पास,
बाद में क्या मेरी ख़ाक से दोस्ती निभाएगा ||
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"हजारों ख्वाहिशें..!!"



बिखरते ख्वाबों को देखा 
सिसकते जज्बातों को देखा 
रुठती हुई खुशियाँ देखीं,
बंद पलकों से
टूटते हुए अरमानों को देखा 

अपनों का बेगानापन देखा
परायों का अपनापन देखा
रिश्तों की उलझन देखीं,
रूकती साँसों ने 
हौले से ज़िन्दगी को मुस्कुराते देखा...

तड़प को भी तड़पते देखा
आसुओं में खुशियों को देखा
नफ़रत को प्यार में बदलते देखा
रिश्तों के मेले में,
कितनों को मिलते-बिछड़ते देखा

नाकामिओं का मंज़र देखा
डूबती उम्मीदों का समंदर देखा
वजूद की जद्दोजेहद देखी
एक जिंदगी ने,
हजारों ख्वाहिशों को मरते देखा...
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Monday, 12 September 2011

"अँधेरी रात..!!"




मैं सोचता हूँ..
 बस रात हो अँधेरी रात
मुझे ले ले अपने नरम बाहों में
मेरी थकी हुई आखों पे उंगलियाँ रख दे
मैं सिर्फ ख्वाब ही देखा करूँ सुन्दर ख्वाब
ना नींद टूटे, ना यादों की चिलमने सरकें
ना कोई ज़ख्म उजाले का मेरे दिल पर लगे
कब से खामोश हूँ, खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
मौसम आते हैं मुझे छू कर गुजर जाते हैं
हकीकत से मैं डरता हूँ इसलिए अक्सर
मैं सोचता हूँ बस रात हो ...
अँधेरी रात !!!
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Thursday, 25 August 2011

"पत्थर की बूत..!!"


हालात देखकर अपने देश की
शर्मिंदा हो जाता हूँ----
धिक्कारती है ज़मीर मेरी, 
क्यों ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ |
एक तरफ है सत्ता की भूख-
और कहीं है पैसे की लूट |
कहा था किसी ने इस देश के लिए--
जय जवान ! जय किसान !
पर किसानों के इस देश में ,
कौन उन्हें अब पूछता है ---
जवानों की तो जाने क्या ....
कितनी बूतें पड़ोस में ही सोते हैं |
इस कलंकित जीवन पर अब....
त्याग और क्रांति का कोई मोल नहीं |
निर्ज़र सी हो गयी है मेरी सभी आशाएं कि....
जय जय कार की ललकार की गूंज- 
भी अब भेद्य नहीं है  कानों को |
लाख बहाने करता हूँ पर....
फ़रिश्ते आते नहीं मौत के, उठाने के लिए ---
बस एक जीवित पत्थर की बूत बन गया हूँ ||
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"वो पगली..!!"


जब देखा एक पगली को तो 
खुद पर रो दिया था मैं
ये जीवन उसके लिए क्या है
न उसका कोई वर्तमान है
ना ही कोई भविष्य है
हाँ उसका एक अतीत जरुर है
जो वो अब शायद उसे याद नहीं
उसके भी कोई घर वाले होंगे
अपने आँगन में उसने भी खेला होगा
मेहंदी लगे उसके हाथों में 
ऐसा सपना उसने भी देखा होगा
आज उसे ना उस आँगन का होश है
ना ही क्यूँ जी रहे हैं इसकी कोई आस है
उसका जीवन भी एक पल में ही बदला होगा
एक पल में ही उसका जीवन कालिख से रंगा होगा
जब उस पगली को देखा तो 
खुद पर रो दिया था मैं
मैंने आईने में खुद को फिर देखा
तो ये ख्याल मेरे अन्दर कौंधा 
ये आइना क्या सही में सच्चाई बतलाता है
हाँ बतलाता तो है
जीवन की वो सच्चाई जो हम भूल जाते हैं
कि एक चोट की देर है ये भी बिखर जायेगा
स भंगुर आईने की तरह....
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Saturday, 9 July 2011

"ख़ामोशी..!!"



एक ख़ामोश रात में
तनहा दोस्तों से दूर
आखें बंद कर एक बार
सोचा तुमको मैंने...
ये अकेली ख़ामोश रात 
और आखों से निकलते 
वो ख़ामोश आँसूं-
एक ख़ामोश सी चाहत 
कि काश तुम पास होती...
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Thursday, 30 June 2011

"२५ पैसा..!!"

२५ पैसा हाँ----
इसे जब भी याद करता हूँ तो 
याद आती है वो प्यारे बचपन के दिन
गणित के सवाल,
स्कूल का गेट और टिफिन 
वो बर्फ की लाल आइसक्रीम 
और वो काली चूरन...
२५ पैसे का एक गोलगुप्पा
एक चाकलेट और दोस्तों से  मारामारी
वक़्त के साथ आज पैसा भी बूढ़ा हो गया
शायद इसलिए लोगों ने इसे किनारा कर दिया
और वो समय आ गया जब इसके मरने पर 
सरकार ने इसे आज दफना दिया ..
दी थीं कई खट्टी-मीठी यादें इस २५ पैसे ने
जो रह रह कर करा जाएँगी अपने ना होने का एहसास....
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Thursday, 26 May 2011

"माँ...!!!"


कितना  खुश  था  मैं  माँ
जब  मैं  तेरे  अन्दर  था  माँ
इस  दुनिया  से  बचाकर  कर  रखा  था  तुमने
कितने  प्यार  से  पाला  था  तुमने

कुछ  भी  तो  नहीं  कहा  था  मैंने
चुपचाप  तेरे  अन्दर  सोया  था  मैं  माँ
तेरे  गोद  में  एक  शुकून  था
जाने  वो  अब  कहाँ  खो  गया  है  माँ

तेरे  गर्भ  में  उस  अन्धकार  में  भी
एक  अजब  सी  शान्ति  थी  माँ
याद  है  न ----
इस  दुनिया  के  प्रकाश  में  आते  ही
पहली  बार  मैं  रोया  था  माँ
वो  तुझसे  अलग  होने  का  दर्द  था  माँ

अभी  भी  तलाशता  हूँ  इस  दुनिया  में
तेरे  आँचल  की  छाओं  का  वो  शुकून  माँ
पर  सर्वत्र  अलसाई  अन्धकार  ही  व्यापत  है  माँ
शायद  भगवान्  ने  तेरी  गोद  की  तरह
दूसरी  कोई  जगह  नहीं  बनाई  है  माँ

सुना  है  तुझसे  जुदा  होते  ही
खुदा  ने  मेरी  मौत  का  वक़्त  मुकरर  किया  था
अब  तो  बस  उस  वक़्त  का  इंतज़ार  है  माँ
जब  मैं  फिर  से  तेरे  गोद  में  शमा  जाऊं  माँ
फिर  से  वो  छाँव  और  वो  शुकून  पाऊं  माँ
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Monday, 23 May 2011

"चाय..!!"


चाय तो बहुत लोग पीते हैं
पर जब तुम पीती हो
तो बात ही कुछ और है
दोनों हाथों से प्याले को
पकड़कर जब तुम उसे
चूमती हो ----
तो वो सुर-सुराहट की आवाज़
मेरे कानों ने मिठास घोल देती है
चाय को अपने साँसों से
जब तुम फूंकती हो
तो बंद कमरे में सर-सराहट होती है
और माहौल में एक ताजगी घुल जाती है
तुम्हारे साथ चाय पीते वक़्त
कई बार ये ख्याल मन में आया ---
काश तुम मुझे भी अपने होठों से चूमती
अपने साँसों की हवा से स्पर्श करती
अगर कमबख्त चाय की जगह
मैं उस प्याले में होता...

Tuesday, 10 May 2011

"झूठे चेहरे..!!"



न जाने कितने चेहरे लगा कर रखते हैं लोग
रोज़ एक नया रूप अपना दिखाते हैं लोग 
किसी को पूरी तरह से समझ सको तुम 
इससे पहले ही अक्सर बदल जाते  हैं लोग 

सच के साथ चलना अब भूल चुके हैं लोग
एक झूठ छुपाने को दस और चेहरे लगते हैं लोग 
किसी दुसरे की हालत पर बाण चलाकर
खुश रहना ही अब जानते हैं लोग 

क्यों अपने अहम् पर अहंकार करते हैं लोग 
दस दोस्तों के साथ दस जिंदगी जीते हैं लोग 
कहीं पकडे न जाएँ इस डर से शायद 
फिर एक झूठ बोल जाया करते हैं लोग
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Tuesday, 3 May 2011

"शहर..!!"



शहर - अब मैं चलता हूँ
दूर किसी और शहर में
नया आशिआना बसना है
नए मुशाफिर से मिलना है

महफ़िल में दोस्तों की
तेरा जिक्र तो जरुर होगा
तेरी वो हवा, वो खुशबू
यादों में छुएंगी मुझे

तेरे साथ गुज़ारे वो दिन
याद बनाकर रखूँगा  मैं
तेरी राहों पर छोड़ी हैं
मैंने अपने कुछ निशाँ
कभी मिटने ना  देना
उसे अपने दामन से
जिंदगी ने यदि मौका दिया
तो फिर आऊंगा तेरे पास
मैं इन यादों के पन्नों को पलटने
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Friday, 22 April 2011

"दर्द..!!"



आज मिले हम बरसों बाद,
मानो समय रुक सा गया है..
ना मेरे पास कोई बात है,
ना तुम कुछ बोल रही हो..
मैं तुम्हें देखता हूँ बस एक टुक..
तेरी नज़रें भी कुछ पथराई सी है..
एक दर्द है तेरी  उन आखों में,
जैसे तुमने कुछ खो दिया है ||

H/English

Aaj mile hum barson baad,
maano samay ruk sa gaya hai..
na mere paas koi baat hai,
naa tum kuchh bol rahi ho..
main tumhain dekhata hun bas ek tuk..
teri nazar bhi kuchh patharai si hain..
ek dard hai teri un aakhon me,
jaise tumne kuchh kho diya hai ||

Tuesday, 19 April 2011

"समाधि..!!"

इस संसार में आज क्यों है इतना क्लेश
क्यों आदमी, आदमी से कर रहा है द्वेष
क्यों जरूरतें नहीं होती हैं जिंदगी भर पूरी
कुछ भी तो तेरा नहीं है यहाँ पर
उससे जितना लिया है उसे उतना लौटना ही है
फिर क्यों....
आदमी को ज़िन्दगी भर है इतना गुमान ..
एक मुट्ठी राख है शमशान में जलने के बाद
बस मेरी यही आखरी इच्छा है कि
मेरी चिता के सामने एक आईना रखना...
देखूंगा कैसे जलकर राख हो रहा हूँ मैं ...
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(H/English)
Is sansaar me aaj kyun hai itna klesh
kyun aadmi, aadmi se kar raha hai dwesh
kyun jaruraten nahi hoti hai zindgi bhar puri..
kuchh bhi to tera nahi hai yahan par
usse jitna liya hai use utna loutana hi hai
fir kyun....
aadmi ko zindgi bhar hai itna gumaan...
ek mutthhi raakh hai shamshan me jalne ke baad
bas meri yahi aakhri ichchha hai ki...
meri chita ke saamne ek aaina rakhana...
dekhunga kaise jalkar raakh ho raha hun main...
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Sunday, 17 April 2011

"तेरा शहर..!!"



सुबह होते ही तेरे शहर से जाना है मुझको,
आज की रात जरा मुझको मना कर सोना..
अगर हो सके तो लौटा दे मुझको मेरी हंसी..
या सारी रात मुझको रुला के सोना,
दीया याद का कोई बुझ न जाए कहीं..
कोई शमा प्यार की जला कर सोना...
मैं नहीं कहता कि रहो उम्र भर साथ मेरे..
बस आज की रात अपना बना कर सोना..
उम्र भर रहूँगा तेरी धड़कन में...
बस आज की रात तुम सीने से लगा कर सोना ||||
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H/English
subah hote hi tere shahar se jana hai mujhko,
aaj ki raat zaraa mujko manaa kar sona..
agar ho sake to louta de mujhko meri hansi..
ya saari raat mujko rula kar sona,
diya yaad ka koi bujh na jaaye kahin,
koi shamaa pyar ki jalaa kar sona...
main nahi kahata ki raho umar bhar saath mere..
bas aaj ki raat apana banaa kar sona..
umar bhar rahunga teri dhadkan me..
bas aaj ki raat tum sine se lagaa kar sona||||
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Saturday, 9 April 2011

"दुपट्टा..!!"




मुद्दतों बाद तेरा दुपट्टा मेरे सामने आया 
देखा इसे तो वो दिन याद आया...
कितनी जिद्द थी तुम्हें इसे लेने की
बड़े अरमानों से ख़रीदा था तुमने...
तेरी गर्दन की ये शान थी
लपेट कर जब तुम इसे चलती थी....
तेरी मतवाली चाल पर ये लहराती थी 
दूर से ही तुम्हें देखकर 
तेरी खुशबू महसूस हो जाती थी
जब तुम इस दुपट्टे से 
अपनी आखें बंद करके 
चेहरे को ढकती थी  और
दाँतों से जब दुपट्टे को कटती थी 
एक अजब सी  ख़ामोशी 
आस पास छा जाती थी 
और जब तुम अपनी आखें खोलतीं
तो मेरे ऊपर तेरी आखों की 
रेशमी चमक की बारिश होती थी...
मुद्दतों बाद तेरा दुपट्टा मेरे सामने आया 
देखा इसे तो वो दिन याद आया...
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(H/English)
"Dupatta"
Muddaton baad tera dupatta mere saamne aaya
Dekha ise to vo din yaad aaya
Kitni zidd thi tumhain ise lene ki
Bade armaanon se kharida tha tumne...
Teri garden ki ye shaan thi
Lappet kar jab tum ise chalti thi...
Teri matwaali chaal par ye lahraati thi
Dur se hi tumhain dekhkar
Teri khushboo mahsus ho jaati thi
Jab tum is dupatte se
Apni aakhen band karke
Chehre ko dhaktin thi aur
Daaton se jab dupatte ko katati thi
Ek ajab si khamoshi
Aas paas chhaa jaati thi
Aur jab tum apni aakhen kholti thi
To mere upar teri aakhon ki
Reshami chamak ki barish hoti thi...
Muddaton baad tera dupatta mere saamne aaya
Dekha ise to vo din yaad aaya...
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Thursday, 24 March 2011

"विरह..!!"


विरह
आज अमावास के अँधेरे में,
तीन जान तनहा भटक रहे हैं |
मैं यहाँ अकेला तुम्हें सोच रहा हूँ,
तुम वहां अकेली खोयी हो,
और ये रात अकेली रो रही है |

चाँद इस रात से  कुछ यूँ खफा है,
कि चांदनी इसे आज नसीब नहीं |
और समय मुझसे कुछ यूँ खफा है.
कि मेरी चांदनी आज मेरे करीब नहीं |  

बस कुछ और दिनों  की विरह है, 
जब चाँद बिखेरेगा रात पर  चांदनी |
ये अमावास की रात खिलखिला उठेगी,
जब तुम्हें मैं अपनी बाहों में लूँगा,
और कोई दूरी न अपने दरमयां रहेंगी  ||
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(H/English)
Virah
Aaj amawas ki raat me,
Tin jaan tanaha bhatak rahe hain |
main yahan akela tumhain soch raha hun,
Tum wahan akeli khoyi ho,
aur ye raat akeli ro rahi hai |

Chaand is raat se kuch yun khafa hai,
ki chandni ise aaj naseeb nahi hai |
aur samay mujhse kuch yun khafa hai,
ki meri chandni mere kareeb nahi hai |

bas kuch aur dinon ki virah hai,
jab chand bikherega raat par chandni |
ye amawas ki raat khilkhila uthegi,
jab tumhain main apni baahon me lunga,
aur koi doori na apne darmaayan rahengi ||
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Tuesday, 22 March 2011

"इंतज़ार..!!"


तुम्हारी थोड़ी देर से, ये जान निकल जाएगी,
तुम्हारी थोड़ी सी बेरुखी से, जिंदगी ख़त्म हो जाएगी !!

हजारों सितम सहे हैं हमने - तुम्हारे खातिर,
ग़मों को पी लिया है, ख़ुशी समझकर तुम्हारे खातिर !!

हर पल हर रात गुजर जाएगी, अगर तुम्हारे इंतज़ार में,
कुछ भी रहेगा जिंदगी में बाकी तुम्हारे इंतज़ार में !!

तुम्हें लगता है कि बहुत वक़्त है तुम्हारे पास,
मगर सालों यूँ ही बीत गए एक पल में तुम्हारे इंतज़ार में !!

अब तो लगता ही नहीं कि कभी ख़त्म होगी ये इंतज़ार,
ना रहेगा तुम्हारा ये नाज़, ना रहेगा उसका इंतज़ार !!!!
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(H/English)
Intezaar
Tumhari thori der se, ye jaan nikal jayegi,
Tumhaari thori si berukhi se, zindagi khatm ho jayegi !!

Hazaroon sitam sahe hain humne- tumhaare khatir,
Gamon ko pi liya hai, khushi samajhkar tumhaare khatir !!

Har pal, har raat gujar jayegi, agar tumhaare intezaar me,
Kuch bhi na rahega zindagi me baaki tumhaare intezaar me !!

Tumhain lagta hai ki bahut waqt hai tumhaare pass,
Magar saalon yun hi bit gaye ek pal me tumhaare intezaar me !!

Ab to lagtahi nahi ki kabhi khatm hogi ye intezaar,
Naa rahega tumhara ye naaz, naa rahega uska intezaar !!
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Thursday, 17 March 2011

" ज़माना..!!"
















वक़्त के सफ़र में                              Waqt ke safar me
लोग आते जाते हैं                              Log aate jaate hain
जैसे इंसान के उम्र में                         Jaise insaan ke umr me
परिधान आते जाते हैं                        Paridhaan aate jaate hain
ज़माने तो बदलते हैं                          Zamaane to badalte hain
राहें भी गुजरती हैं                             Raahen bhi gujarti hain
ऐसे ही हर एक मोड़ पे                      Aise hi har mod pe
मुसाफिर आते जाते हैं                      Musafir aate jaate hain
बदलता नहीं है सफ़र                        Badalta nahi hai safar
किसी के आने जाने से                      Kisi ke aane jaane se
मुसाफिर बदल जाते हैं                     Musafir badal jaate hain
मुकाम बदल जाते हैं                        Mukam badal jaate hain
समय बदल जाते हैं                         Samay badal jaate hain
इंसान बदल जाते हैं                         Insaan badal jaate hain
पर तुम न बदलना ऐसे                    Par tum na badalna aise
क्योंकि आगे जब हम मिलें              Kyunki aage jab hum milen
तुम्हें ऐसे ही देखना चाहते हैं             Tumhain aise hi dekhana chahte hain
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Thursday, 10 March 2011

"वीरान शहर..!!"

यहाँ ना अब फूल खिलते हैं
ना चमन में तितलियाँ उडती हैं
कि शहर अब वीरान रहता है
लाखों लोग यहाँ घूमते  हैं
पर किसी के दिल में अब ना उमंग रहती है
अपने अपने कब्र में बस यहाँ मुर्दे रहते हैं
होली में अब सड़कों पर रंग नहीं गिरते हैं
कि बच्चों कि वो टोली, वो झुण्ड नहीं मिलती है
दिवाली में पटाखों कि गूंज भी अब नहीं सुनती है
कि अब मेले में वो भीड़, वो शोर नहीं होती है
अब शादी में भी इतने लोग नहीं दीखते हैं
कि पहले मय्यतों में जितनी भीड़ होती थी
मोहल्ले से जब किसी कि बारात जाती है
तो लोगों कि खिड़कियाँ अब बंद रहती है
लोग अब अपने दुःख से उतना दुखी नहीं होते हैं
जितना कि पडोसी के सुख से दुखी हो जाते हैं
दिल यह  सोच कर बार बार रोता है
कि शहर ही वीराना होता है
या यहाँ सिर्फ मुर्दे ही बसते हैं...||
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(H/English)
Yahan na ab ful khilte hain
Naa chaman me titliyaan uadti hain
Ki shahar ab viraan rahata hai
Laakhon log yahan ghumte hain
Par kisi ke dil me ab na umang rahati hai
Apne apne kabr me bas yahan murde rahate hain
Holi me ab yahan sadkon par rang nahi girte hain
Ki bachchon ki toil, vo jhund nahi milti hai
Diwali me patakhon ki gunj bhi ab nahi sunti hai
Ki mele me ab wo bhid, vo shor nahi hoti hai
Ab shaadi me bhi itne log nahi dikhate hain
Ki pahale mayatton me jitni bhid hoti thi
Mohalle me jab kisi ki barat jaati hai
To logon ki khidkiyaan ab band rahati hain
Log ab apne dukh se utna dukhi nahi hote hain
Jitna ki padosi ke sukh se dukhi ho jaate hain
Dil yah soch kar baar baar rota hai
Ki shahar hi veerana hota hai
Ya yahan sirf murde hi baste hain…||
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Monday, 7 March 2011

"जाने क्यों..||"





शहर ये अनजाना सा लगने लगा  है..
कि शाम ये तन्हा  सी लगने लगी है..
तुम जो यूँ चली जा रही हो यहाँ से..
कि हर ख़वाब अधुरा सा लगने लगा है..|

दोस्त वही  हैं, वही भीड़ भी हो रही है,
पर झुंड से वो हंसी गायब हो रही है..
मौसम बदला बदला सा लग रहा है...
और अब अपना भी अनजाना लग रहा है..|

आज वक़्त का परिंदा क्यों नहीं रुक रहा है..
कि ये रात कितनी छोटी लग रही है...
तुम्हें ही देख रहा हूँ मैं...
ये आखें मेरी जब भी लग रही है..|

पैर नहीं उठ रहे तुमसे जुदा होने को...
जाने कौन इसे आज रोक रहा है...
दिल तन्हा तन्हा टूट रहा है...
जाने क्या पीछे छुट रहा है..||
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(H/English)
Shahar ye anjaana sa lagne laga hai..
Ki shaam ye tanha si lagne lagi hai..
Tum jo yun chali ja rahi ho yahan se..
Ki har khwab adhura sa lagne laga hai..|

Dost wahi hain, wahi bheed bhi ho rahi hai,
Par jhund se wo hansi gayab ho rahi hai..
Mousam badla badla sa lag raha hai…
Aur ab apna bhi anjaana lag raha hai..|

Aaj waqt ka parinda kyun nahi ruk raha hai..
Ki ye raat kitni chhoti lag rahi hai…
Tumhain hi dekh raha hun main…
Ye aakhen meri jab bhi lag rahi hain..|

Pair nahi uth rahe tumse juda hone ko…
Jaane koun ise aaj rok raha hai...
Dil tanha – tanha tut raha hai…
Jaane kya pichhe chhut raha hai..||
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Monday, 28 February 2011

" फिर मिलेंगे...!!"



अलग-अलग शहरों से आकर, मिले हम एक अनजानी जगह में
सपने हैं बेगाने, मंजिलें हैं अलग, राहें हैं अनजानी, ढंग हैं अलग

आरम्भ में थे कुछ बिखरे बिखरे, बाद में दोस्ती ने कुछ रंग बिखेरे,
इसके एहसास ने ऐसा  मिलाया हमें, कि हर महफ़िल में रंग जमने लगे ||

वक़्त बेवक़्त मिले, कहीं भी गए, ज़िन्दगी को लम्हों में जीने लगे,
एक नए सिरे से, एक नए तरीके से, जिंदगी यूँ ही बीत जाती तो अच्छा था ||

पर हम भूल गए कि ये जिंदगी है, वक़्त मिलाता है और जुदा भी करता है,
राहें आगे अभी और भी हैं, आगे और भी मुसाफिर कहीं  हमारी इंतज़ार में हैं ||

मुझे अब तुमसे जुदा होने दो, कि आज वक़्त का यही दस्तूर है ,
तुम्हारे साथ गुजारे वो कुछ पल, याद आयेंगे ज़िन्दगी में रह-रह कर ||

तुम्हारी यादों में बसे, इतने भी हम खुशनसीब नहीं,
बस पहचान लेना मुझे, आगे के सफ़र में कभी,
मैं तो फिर मिलूँगा, यूं हीं चलते - चलते कहीं |||
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(H/English)

Alag-alag shaharon se aakar, mile hum ek anajaani jagah me
Sapne hain begaane, manjilen hain alag, raahen anjaani, dhang hain alag

Aarambh me the kuchh bikhre bikhre, baad me dosti ne kuch rang bikhere,
Iske ehsaas ne aisa milaya humain, ki har mahfeel me rang jamne lage ||

Waqt-bewaqt mile, kahin bhi gaye, zindgi ko lamhon me jine lage,
Ek naye sire se, ek naye tarike se, zindgi yun hi bit jaati to achchha tha ||

Par hum bhool gaye ki ye zindgi hai, waqt milata hai aur juda bhi karta hai,
Raahen aage abhi aur bhi hain, aage aur bhi musaafir kahin hamari intezaar me hain ||

Mujhe ab tumse juda hone do, ki aaj waqt ka yahi dastoor hai,
Raahen aage abhi aur bhi hain, aage aur bhi musafir kahin hamari intezaar me hain ||
Tumhaare saath gujaare wo kuch pal, yaad aayenge zindagi me rah-rah kar ||

Tumhari yaadon me basen, itne bhi hum khushnaseeb nahi,
Bas pahchaan lena mujhe, aage ke safar me kabhi,
Main to fir milunga, yun hi chalate - chalate kahin |||
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Saturday, 5 February 2011

"भिखारी..!!!"



वो खड़ा सड़क पर नज़र लगाये,
 देखता हर आने जाने वाले को
हर अनजाने से आस लगाये, 
कोशिश करता कुछ पाने को

हाथ फैलाये सर झुकाए, 
हर एक बात सुनता वो
मिल जाए उसे कुछ भी,
बस यही है  चाहता वो 

हम भी अपने धून में चलते, 
पलट कर उसे न देखते 
मुंह से कुछ बुदबुदाते और, 
अपने रास्ते पर बढ जाते

कोई लाचार पड़ा है सड़क पर, 
किन्तु हम अपनी जेब नहीं खोलते
दे देते हैं मुफ्त में  गाली उनको,
सह लेते हैं सब, हैं ये मजबूरी उनकी

उनकी क्या दिवाली और होली होती है, 
दो वक़्त की रोटी जुटाने में जिंदगी कटती है 
दे दो जो भी उनको, अपना नसीब समझते हैं, 
गाली या खाना मिल जाए उसी में खुश रहते हैं
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Sunday, 30 January 2011

"कलम - ...!!"



ऐ कलम मुझे माफ़ कर
जो मैं तुम्हें छोड़ कर 
इस संभ्रम दुनिया में आया
सोचा छोड़ कर तुझे मैं जी लूँगा 
इस दुनिया में
पर यहाँ आकर समझ में आया
कि ये पेचीदगी शायद 
मुझसे सुलझेगी नहीं
ये एक ऐसी अत्यंत अनंत डोर है
जो खुद से उलझती जाती है 
इसे सुलझाने की कोशिश में 
मैं खुद ही इसमें उलझ कर रह गया
खुल तो नहीं पायीं ये सारी उलझनें 
पर अब इस रिश्ते नाते के बंधन को 
तोड़ कर आया हूँ मैं, तेरे शरण में 
दुबारा पुनः  एक बार
दे दो मुझे मेरी उँगलियों पर फिर से
वो काली स्याही के निशान
वो कोरे कागज के पन्ने
और किताबों की बारात
सजाना चाहता हूँ मैं फिर अपनी दुनिया 
इसी शब्दों के बीच में
बेवकूफ था मैं जो इसकी बादशाहत 
छोड़कर गया था इस निष्ठूर संसार में
इसलिए तेरे शरण में
लौट आया मैं सुमन , ऐ-- 'कलम' 
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Friday, 21 January 2011

"दोस्त..!!"


दोस्त..
यूँ तो आइना रोज़ देखता हूँ ,
अपने चेहरे को रोज़ सवांरता हूँ ...
रोज़ वही शख्स दिखता है आईने में ,
कुछ खोया हुआ सा अपने ख्यालों में !

पर आज अचानक ऐसा लगा मानो --
आईने ने मुझे देखा हो पहली बार ...
अपने ही अक्स को देखकर मैं घबराया ...
खुद को अपने ही सामने बेबस पाया !

कुछ ऐसी भूली हुई तस्वीरें दिखीं...
भावनाएं फिर मुझसे ना छुपीं ,
रो पड़ा मैं उसी वक़्त कि ,
सारी तस्वीरें गीली हो चलीं  ...

जिनका भी साथ जीवन में पाया ,
साथ जिनके मैंने समय बिताया ...
जाने कहाँ खो गए वो संगे - साथी ,
मैं उनसे दूर राह पर निकल आया !

मुझे माफ़ करना मेरे दोस्तों कि--
समय ने मुझे कुछ ऐसे दौड़ाया ....
तुमसे एक बार दुबारा मिल सकूँ ,
इसका भी मैंने आस गवांया !

अब तक का सफ़र हुआ सुखद ....
है शुक्रिया तुम सभी का ....
जिसने भी इस जीवन पथ पर ---
है मेरा साथ निभाया ....!!
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Wednesday, 19 January 2011

"मेरी चांदनी..!!!"

मेरी चांदनी..
तेरे चेहरे की खिलती हंसी देख...,
सुबह  आज  हसीन दिख रही है !

तेरी जुल्फों में फंसा वो पानी का बूँद ,
जैसे ओंस की तरह चमक रही है !

अपनी नज़रों से यूँ न देखो मुझे ,
कि एक अजब सी मदहोसी छा रही है !

तेरे आँचल को तुमने कुछ यूँ लहराया ,
कि बसंती हवा की बयार चल रही है !

अपने कदम संभाल कर तुम चलना ,
वरना तेरी चाल पर हम बेमौत मारे जायेंगे !

आज तेरी तारीफ़ मैंने चाँद से कुछ यूँ की ,
कि वो तेरे दीदार को बेचैन हो गया...!

तुम आज रात पर्दा करके बाहर निकलना ,
नहीं तो चाँद की नज़र 'मेरी चांदनी' को लग जाएगी....!!!!
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Tuesday, 18 January 2011

"तन्हाई से.... फिर तन्हाई तक...!!!"

"तन्हाई से.... फिर तन्हाई तक...!!!"

तूने ना कुछ  ख़ता  की.. 
ना मुझसे कोई  गलती हुई !
बस वक़्त ही मुझसे खफा हो गयी --
जो ये एहसास मुझे देर से हुई !!

तुमसे ना कोई शिकवा है ...
ना तुझसे कोई शिकायत करूँगा --
इस पल ने जो मीठे एहसास दिए..
उसके लिए तुम्हारा शुक्रिया कहूँगा !!

उन दिनों जब मैं तुम्हें सोचने  लगा--
मेरी दुनिया और सपने  बदल गयी..
तब मुझे पता चला ---
किसी को चाहना क्या होता है... !!

थोडा दर्द तो होगा मुझे...
इस एहसास को भुलाने में ! 
पर भरोसा है मुझे खुद पर --
कि संभल जाऊंगा मैं एक दिन !!
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Sunday, 9 January 2011

"बेबसी...!!!"

"बेबसी...!!!"



आज कोरे काजग में क्यों...
अपने जीवन का कोरापन दिखता है |
बैठा था कुछ लिखने फ़साने जीवन के..
क्यों मेरे आंसुओं से ये गिला हो जाता है ||

हसरतें बहुत हैं उमड़ती मेरे अन्दर--
पर हो गया हूँ मैं बेबस इस तरह कि...
इस ठूंठ दुनिया में ------
जिंदगी एक छांव की तालाश करती  है ||

अपनों  ने भी ठुकराया ऐसे कि....
अब किसी पर आस होती नहीं है |
दे दो मुझे सहारा एक  बैसाखी का...
कि मेरे पैर भी अब लाचार दिखते हैं |||
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Wednesday, 5 January 2011

"ज़िन्दगी-- तुझसे आगे...!!!"

"ज़िन्दगी-- तुझसे आगे...!!!"
जीवन के इस आपाधापी में मैं..
कुछ पल चलता, कुछ पल रुकता मगर
इस कुछ- पल में.. ज़िन्दगी मुझसे आगे बढ जाती,
फिर भी, मैं हर पल मुस्कुराता....
ज़िन्दगी मुझपर होकर हैरान
बोली ----
तुम हार रहे हो फिर भी मुस्कुराते हो नादान !!!

मैं अपनी हार पर या किसी के जीत पर हूँ अटल 
अपनी चाल में चलना है मुझे ये जीवन
आज तू ज़िन्दगी जीत जाएगी...
पर एक दिन एक ऐसी सीमा आएगी कि
तू थक कर, एक कदम आगे भी न जा पाएगी
तब भी मैं रहूँगा अचल
मुस्कुराते हुए ही,
ऐ ज़िन्दगी- जाऊँगा तुझसे आगे निकल
और तू करेगी मेरा इंतज़ार
लौट कर मैं न आऊंगा और
उस अलग संसार में भी मैं मुस्कुराऊंगा
फिर निकल जाऊंगा नए एक ऐसे सफ़र पर
जहाँ अनजान रास्ते और अनजान हमसफ़र मेरी राह तकेंगी !!
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Monday, 3 January 2011

"तन्हाई..!!!"

तन्हाई

चलता था नंगे पैर सागर किनारे, साथ तन्हाई चलती थी
लहरों की आवाज़ सुन तन्हाई भी अंगड़ाई लेती थी
पर सागर की गहराइयों से डर मेरे अन्दर ही रहती थी
मेरा हर वक़्त पीछा करती थी मेरी तन्हाई

फिर क्यों तुमने मेरी तन्हाई को छुआ
अब ये शिकायत करती है मुझसे
तन्हा नहीं रहना अब मेरी तन्हाई को
तेरे साथ कि ये हर वक़्त गुजारिश करती है

तेरा चेहरा इसे अब चाँद नज़र आता है
पास बैठी रहो बस इसे निहारना चाहता है
तुम बिखेर देती हो वो चांदनी कि
मेरी तन्हाई को एक साथी मिल जाता है

कि अक्सर मेरी तन्हाई मुझसे शिकायत करती है
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