Monday, 28 February 2011

" फिर मिलेंगे...!!"



अलग-अलग शहरों से आकर, मिले हम एक अनजानी जगह में
सपने हैं बेगाने, मंजिलें हैं अलग, राहें हैं अनजानी, ढंग हैं अलग

आरम्भ में थे कुछ बिखरे बिखरे, बाद में दोस्ती ने कुछ रंग बिखेरे,
इसके एहसास ने ऐसा  मिलाया हमें, कि हर महफ़िल में रंग जमने लगे ||

वक़्त बेवक़्त मिले, कहीं भी गए, ज़िन्दगी को लम्हों में जीने लगे,
एक नए सिरे से, एक नए तरीके से, जिंदगी यूँ ही बीत जाती तो अच्छा था ||

पर हम भूल गए कि ये जिंदगी है, वक़्त मिलाता है और जुदा भी करता है,
राहें आगे अभी और भी हैं, आगे और भी मुसाफिर कहीं  हमारी इंतज़ार में हैं ||

मुझे अब तुमसे जुदा होने दो, कि आज वक़्त का यही दस्तूर है ,
तुम्हारे साथ गुजारे वो कुछ पल, याद आयेंगे ज़िन्दगी में रह-रह कर ||

तुम्हारी यादों में बसे, इतने भी हम खुशनसीब नहीं,
बस पहचान लेना मुझे, आगे के सफ़र में कभी,
मैं तो फिर मिलूँगा, यूं हीं चलते - चलते कहीं |||
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(H/English)

Alag-alag shaharon se aakar, mile hum ek anajaani jagah me
Sapne hain begaane, manjilen hain alag, raahen anjaani, dhang hain alag

Aarambh me the kuchh bikhre bikhre, baad me dosti ne kuch rang bikhere,
Iske ehsaas ne aisa milaya humain, ki har mahfeel me rang jamne lage ||

Waqt-bewaqt mile, kahin bhi gaye, zindgi ko lamhon me jine lage,
Ek naye sire se, ek naye tarike se, zindgi yun hi bit jaati to achchha tha ||

Par hum bhool gaye ki ye zindgi hai, waqt milata hai aur juda bhi karta hai,
Raahen aage abhi aur bhi hain, aage aur bhi musaafir kahin hamari intezaar me hain ||

Mujhe ab tumse juda hone do, ki aaj waqt ka yahi dastoor hai,
Raahen aage abhi aur bhi hain, aage aur bhi musafir kahin hamari intezaar me hain ||
Tumhaare saath gujaare wo kuch pal, yaad aayenge zindagi me rah-rah kar ||

Tumhari yaadon me basen, itne bhi hum khushnaseeb nahi,
Bas pahchaan lena mujhe, aage ke safar me kabhi,
Main to fir milunga, yun hi chalate - chalate kahin |||
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Saturday, 5 February 2011

"भिखारी..!!!"



वो खड़ा सड़क पर नज़र लगाये,
 देखता हर आने जाने वाले को
हर अनजाने से आस लगाये, 
कोशिश करता कुछ पाने को

हाथ फैलाये सर झुकाए, 
हर एक बात सुनता वो
मिल जाए उसे कुछ भी,
बस यही है  चाहता वो 

हम भी अपने धून में चलते, 
पलट कर उसे न देखते 
मुंह से कुछ बुदबुदाते और, 
अपने रास्ते पर बढ जाते

कोई लाचार पड़ा है सड़क पर, 
किन्तु हम अपनी जेब नहीं खोलते
दे देते हैं मुफ्त में  गाली उनको,
सह लेते हैं सब, हैं ये मजबूरी उनकी

उनकी क्या दिवाली और होली होती है, 
दो वक़्त की रोटी जुटाने में जिंदगी कटती है 
दे दो जो भी उनको, अपना नसीब समझते हैं, 
गाली या खाना मिल जाए उसी में खुश रहते हैं
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