Thursday, 24 March 2011

"विरह..!!"


विरह
आज अमावास के अँधेरे में,
तीन जान तनहा भटक रहे हैं |
मैं यहाँ अकेला तुम्हें सोच रहा हूँ,
तुम वहां अकेली खोयी हो,
और ये रात अकेली रो रही है |

चाँद इस रात से  कुछ यूँ खफा है,
कि चांदनी इसे आज नसीब नहीं |
और समय मुझसे कुछ यूँ खफा है.
कि मेरी चांदनी आज मेरे करीब नहीं |  

बस कुछ और दिनों  की विरह है, 
जब चाँद बिखेरेगा रात पर  चांदनी |
ये अमावास की रात खिलखिला उठेगी,
जब तुम्हें मैं अपनी बाहों में लूँगा,
और कोई दूरी न अपने दरमयां रहेंगी  ||
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(H/English)
Virah
Aaj amawas ki raat me,
Tin jaan tanaha bhatak rahe hain |
main yahan akela tumhain soch raha hun,
Tum wahan akeli khoyi ho,
aur ye raat akeli ro rahi hai |

Chaand is raat se kuch yun khafa hai,
ki chandni ise aaj naseeb nahi hai |
aur samay mujhse kuch yun khafa hai,
ki meri chandni mere kareeb nahi hai |

bas kuch aur dinon ki virah hai,
jab chand bikherega raat par chandni |
ye amawas ki raat khilkhila uthegi,
jab tumhain main apni baahon me lunga,
aur koi doori na apne darmaayan rahengi ||
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5 comments:

  1. hmm ghar jane ka khoob jaldi hai, kaun wait kar raha hai udhar?

    lol :-) :D :P

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  2. बहुत बढ़िया...

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  3. wah kya baat hai..kaun hai tumhari chandani??;)

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  4. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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