Wednesday, 9 May 2012

" खामोश मूर्ति..!!"



एक फ़साना शुरू होने से पहले ही,
जाने क्यूँ तू मुझसे रूठ गयी
सोचा था कुछ दूर साथ चलेंगे,
उससे पहले ही तुम चुप हो गयी 
अब तो बस  खामोश हूँ...
खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
मौसम आते हैं... मुझे छू कर गुजर जाते हैं.!!!!
----------*----------

5 comments:

  1. बहुत खूब
    मूर्तियां भी सजीव होंगी कभी

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  2. खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
    मौसम आते हैं... मुझे छू कर गुजर जाते हैं.!!!!

    Wah Wah!!!!

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  3. खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
    मौसम आते हैं... मुझे छू कर गुजर जाते हैं.!!!!

    Wah Wah!!!

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  4. बहुत अच्छा, बढिया लिखती हैं आप। आभार

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  5. बहुत प्यारी रचना....
    सुन्दर लेखन..

    अनु

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