Tuesday, 19 April 2011

"समाधि..!!"

इस संसार में आज क्यों है इतना क्लेश
क्यों आदमी, आदमी से कर रहा है द्वेष
क्यों जरूरतें नहीं होती हैं जिंदगी भर पूरी
कुछ भी तो तेरा नहीं है यहाँ पर
उससे जितना लिया है उसे उतना लौटना ही है
फिर क्यों....
आदमी को ज़िन्दगी भर है इतना गुमान ..
एक मुट्ठी राख है शमशान में जलने के बाद
बस मेरी यही आखरी इच्छा है कि
मेरी चिता के सामने एक आईना रखना...
देखूंगा कैसे जलकर राख हो रहा हूँ मैं ...
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(H/English)
Is sansaar me aaj kyun hai itna klesh
kyun aadmi, aadmi se kar raha hai dwesh
kyun jaruraten nahi hoti hai zindgi bhar puri..
kuchh bhi to tera nahi hai yahan par
usse jitna liya hai use utna loutana hi hai
fir kyun....
aadmi ko zindgi bhar hai itna gumaan...
ek mutthhi raakh hai shamshan me jalne ke baad
bas meri yahi aakhri ichchha hai ki...
meri chita ke saamne ek aaina rakhana...
dekhunga kaise jalkar raakh ho raha hun main...
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2 comments:

  1. हे प्रभु देखना कि‍ देखने वाला बच जाये।

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