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Saturday, 31 March 2012

"बारिश..!!"


बारिश की वो पहली बूँद जब पलकों पर गिरी
तेरी पहली छुअन का मेरे मन को एहसास हुआ
तेरे साथ जो गुजारे थे वो खुबसूरत पल 
हर क्षण में उसकी भूली हुई सी याद के भंवर में घूमता रहा
जाने वो कौन सी मनहूस घड़ी थी
मेरे आगोश से तुझे जुदा कर गयी...
आज भी सावन की पहली बूंदों में 
तेरी ताज़गी को महसूस करता हूँ
यही सोच कर अक्सर मैं ---
बारिश में अकेला ही भीग लेता हूँ....
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Friday, 10 February 2012

"दीदार..!!"



कल देखा था तुम्हें मुस्कुराते हुए
इसी जगह पर कहीं
फूल खिले थे चमन में
तेरे चहकने से यहीं 

तेरा रूप देखा तो 
मेरे दबे हुए ख्यालों को 
एक मुकाम मिल गया

बरसों से नहीं सोया था
इस थके आखों को 
एक सहारा मिल गया 

सामने तो तू अब है नहीं
सपने में मिलने का 
एक बहाना मिल गया

आशिकी की नहीं है मैंने 
पर तेरा दीदार
मुझे दीवाना बना गया
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Saturday, 21 January 2012

"इश्क..!!"


एक इश्क है दुनिया में 
जो दौलत से नहीं मिलती 
कहने को तो दुनिया में 
बाज़ार हजारों हैं
इस हुस्न की दुनिया में 
दिलदार हजारों हैं
एक तुम्ही को हमने 
इस दिल में बसाया है
कहने को तो दुनिया में 
दिलदार हजारों हैं
मैं देख चूका हूँ ये
इस आज की दुनिया को
मारे हुए मतलब के
यार हज़ारों हैं...
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Saturday, 31 December 2011

"नया साल..!!"



शाम फिर आज खाली खाली सी है
तन्हाई ने फिर
तनहा रहने की तरकीब निकाली है
दूर डूब रहा है सूरज
साथ में पुराने सारे पल 
अब नयी किरण आएगी 
नए साल के साथ 
सब कुछ नया होगा उस पल में 
नया साल होगा और पुराना मैं 
वक़्त कहता है टूट जाऊंगा मैं
पर जोड़ के खुद को खुद से
फिर से वापस आऊंगा मैं 
नयी किरण की ताजगी होगी
और फिर से मुस्कुराऊंगा मैं
कि नए साल में 
फिर नया होकर आऊंगा मैं 
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Monday, 10 October 2011

"जिद्द..!!"



एक दिन चला जाऊंगा मैं चुपके से...
पीछे छोड़ कर सभी को इस दुनिया से,
रूठना - मनाना सब रह जायेगा अधुरा... 
कि बस मेरा शरीर रहेगा जलाने के लिए | 

गरम शरद की बात ही क्या...
एक दिन तो जलना है चिता पर मुझे,
आग की लपटों से ऊँचा जाना है मुझे,
उठते धुएं से भी दूर निकलना है मुझे |

कर ले जितनी जिद्द करनी है तुझे...
मैं तो हर पल ही मुस्कुराऊंगा...
मना ले मुझे कि अभी भी वक़्त है तेरे पास,
बाद में क्या मेरी ख़ाक से दोस्ती निभाएगा ||
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"हजारों ख्वाहिशें..!!"



बिखरते ख्वाबों को देखा 
सिसकते जज्बातों को देखा 
रुठती हुई खुशियाँ देखीं,
बंद पलकों से
टूटते हुए अरमानों को देखा 

अपनों का बेगानापन देखा
परायों का अपनापन देखा
रिश्तों की उलझन देखीं,
रूकती साँसों ने 
हौले से ज़िन्दगी को मुस्कुराते देखा...

तड़प को भी तड़पते देखा
आसुओं में खुशियों को देखा
नफ़रत को प्यार में बदलते देखा
रिश्तों के मेले में,
कितनों को मिलते-बिछड़ते देखा

नाकामिओं का मंज़र देखा
डूबती उम्मीदों का समंदर देखा
वजूद की जद्दोजेहद देखी
एक जिंदगी ने,
हजारों ख्वाहिशों को मरते देखा...
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Monday, 12 September 2011

"अँधेरी रात..!!"




मैं सोचता हूँ..
 बस रात हो अँधेरी रात
मुझे ले ले अपने नरम बाहों में
मेरी थकी हुई आखों पे उंगलियाँ रख दे
मैं सिर्फ ख्वाब ही देखा करूँ सुन्दर ख्वाब
ना नींद टूटे, ना यादों की चिलमने सरकें
ना कोई ज़ख्म उजाले का मेरे दिल पर लगे
कब से खामोश हूँ, खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
मौसम आते हैं मुझे छू कर गुजर जाते हैं
हकीकत से मैं डरता हूँ इसलिए अक्सर
मैं सोचता हूँ बस रात हो ...
अँधेरी रात !!!
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Thursday, 25 August 2011

"पत्थर की बूत..!!"


हालात देखकर अपने देश की
शर्मिंदा हो जाता हूँ----
धिक्कारती है ज़मीर मेरी, 
क्यों ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ |
एक तरफ है सत्ता की भूख-
और कहीं है पैसे की लूट |
कहा था किसी ने इस देश के लिए--
जय जवान ! जय किसान !
पर किसानों के इस देश में ,
कौन उन्हें अब पूछता है ---
जवानों की तो जाने क्या ....
कितनी बूतें पड़ोस में ही सोते हैं |
इस कलंकित जीवन पर अब....
त्याग और क्रांति का कोई मोल नहीं |
निर्ज़र सी हो गयी है मेरी सभी आशाएं कि....
जय जय कार की ललकार की गूंज- 
भी अब भेद्य नहीं है  कानों को |
लाख बहाने करता हूँ पर....
फ़रिश्ते आते नहीं मौत के, उठाने के लिए ---
बस एक जीवित पत्थर की बूत बन गया हूँ ||
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"वो पगली..!!"


जब देखा एक पगली को तो 
खुद पर रो दिया था मैं
ये जीवन उसके लिए क्या है
न उसका कोई वर्तमान है
ना ही कोई भविष्य है
हाँ उसका एक अतीत जरुर है
जो वो अब शायद उसे याद नहीं
उसके भी कोई घर वाले होंगे
अपने आँगन में उसने भी खेला होगा
मेहंदी लगे उसके हाथों में 
ऐसा सपना उसने भी देखा होगा
आज उसे ना उस आँगन का होश है
ना ही क्यूँ जी रहे हैं इसकी कोई आस है
उसका जीवन भी एक पल में ही बदला होगा
एक पल में ही उसका जीवन कालिख से रंगा होगा
जब उस पगली को देखा तो 
खुद पर रो दिया था मैं
मैंने आईने में खुद को फिर देखा
तो ये ख्याल मेरे अन्दर कौंधा 
ये आइना क्या सही में सच्चाई बतलाता है
हाँ बतलाता तो है
जीवन की वो सच्चाई जो हम भूल जाते हैं
कि एक चोट की देर है ये भी बिखर जायेगा
स भंगुर आईने की तरह....
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Saturday, 9 July 2011

"ख़ामोशी..!!"



एक ख़ामोश रात में
तनहा दोस्तों से दूर
आखें बंद कर एक बार
सोचा तुमको मैंने...
ये अकेली ख़ामोश रात 
और आखों से निकलते 
वो ख़ामोश आँसूं-
एक ख़ामोश सी चाहत 
कि काश तुम पास होती...
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Thursday, 30 June 2011

"२५ पैसा..!!"

२५ पैसा हाँ----
इसे जब भी याद करता हूँ तो 
याद आती है वो प्यारे बचपन के दिन
गणित के सवाल,
स्कूल का गेट और टिफिन 
वो बर्फ की लाल आइसक्रीम 
और वो काली चूरन...
२५ पैसे का एक गोलगुप्पा
एक चाकलेट और दोस्तों से  मारामारी
वक़्त के साथ आज पैसा भी बूढ़ा हो गया
शायद इसलिए लोगों ने इसे किनारा कर दिया
और वो समय आ गया जब इसके मरने पर 
सरकार ने इसे आज दफना दिया ..
दी थीं कई खट्टी-मीठी यादें इस २५ पैसे ने
जो रह रह कर करा जाएँगी अपने ना होने का एहसास....
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Thursday, 26 May 2011

"माँ...!!!"


कितना  खुश  था  मैं  माँ
जब  मैं  तेरे  अन्दर  था  माँ
इस  दुनिया  से  बचाकर  कर  रखा  था  तुमने
कितने  प्यार  से  पाला  था  तुमने

कुछ  भी  तो  नहीं  कहा  था  मैंने
चुपचाप  तेरे  अन्दर  सोया  था  मैं  माँ
तेरे  गोद  में  एक  शुकून  था
जाने  वो  अब  कहाँ  खो  गया  है  माँ

तेरे  गर्भ  में  उस  अन्धकार  में  भी
एक  अजब  सी  शान्ति  थी  माँ
याद  है  न ----
इस  दुनिया  के  प्रकाश  में  आते  ही
पहली  बार  मैं  रोया  था  माँ
वो  तुझसे  अलग  होने  का  दर्द  था  माँ

अभी  भी  तलाशता  हूँ  इस  दुनिया  में
तेरे  आँचल  की  छाओं  का  वो  शुकून  माँ
पर  सर्वत्र  अलसाई  अन्धकार  ही  व्यापत  है  माँ
शायद  भगवान्  ने  तेरी  गोद  की  तरह
दूसरी  कोई  जगह  नहीं  बनाई  है  माँ

सुना  है  तुझसे  जुदा  होते  ही
खुदा  ने  मेरी  मौत  का  वक़्त  मुकरर  किया  था
अब  तो  बस  उस  वक़्त  का  इंतज़ार  है  माँ
जब  मैं  फिर  से  तेरे  गोद  में  शमा  जाऊं  माँ
फिर  से  वो  छाँव  और  वो  शुकून  पाऊं  माँ
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Monday, 23 May 2011

"चाय..!!"


चाय तो बहुत लोग पीते हैं
पर जब तुम पीती हो
तो बात ही कुछ और है
दोनों हाथों से प्याले को
पकड़कर जब तुम उसे
चूमती हो ----
तो वो सुर-सुराहट की आवाज़
मेरे कानों ने मिठास घोल देती है
चाय को अपने साँसों से
जब तुम फूंकती हो
तो बंद कमरे में सर-सराहट होती है
और माहौल में एक ताजगी घुल जाती है
तुम्हारे साथ चाय पीते वक़्त
कई बार ये ख्याल मन में आया ---
काश तुम मुझे भी अपने होठों से चूमती
अपने साँसों की हवा से स्पर्श करती
अगर कमबख्त चाय की जगह
मैं उस प्याले में होता...

Tuesday, 10 May 2011

"झूठे चेहरे..!!"



न जाने कितने चेहरे लगा कर रखते हैं लोग
रोज़ एक नया रूप अपना दिखाते हैं लोग 
किसी को पूरी तरह से समझ सको तुम 
इससे पहले ही अक्सर बदल जाते  हैं लोग 

सच के साथ चलना अब भूल चुके हैं लोग
एक झूठ छुपाने को दस और चेहरे लगते हैं लोग 
किसी दुसरे की हालत पर बाण चलाकर
खुश रहना ही अब जानते हैं लोग 

क्यों अपने अहम् पर अहंकार करते हैं लोग 
दस दोस्तों के साथ दस जिंदगी जीते हैं लोग 
कहीं पकडे न जाएँ इस डर से शायद 
फिर एक झूठ बोल जाया करते हैं लोग
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Tuesday, 3 May 2011

"शहर..!!"



शहर - अब मैं चलता हूँ
दूर किसी और शहर में
नया आशिआना बसना है
नए मुशाफिर से मिलना है

महफ़िल में दोस्तों की
तेरा जिक्र तो जरुर होगा
तेरी वो हवा, वो खुशबू
यादों में छुएंगी मुझे

तेरे साथ गुज़ारे वो दिन
याद बनाकर रखूँगा  मैं
तेरी राहों पर छोड़ी हैं
मैंने अपने कुछ निशाँ
कभी मिटने ना  देना
उसे अपने दामन से
जिंदगी ने यदि मौका दिया
तो फिर आऊंगा तेरे पास
मैं इन यादों के पन्नों को पलटने
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Friday, 22 April 2011

"दर्द..!!"



आज मिले हम बरसों बाद,
मानो समय रुक सा गया है..
ना मेरे पास कोई बात है,
ना तुम कुछ बोल रही हो..
मैं तुम्हें देखता हूँ बस एक टुक..
तेरी नज़रें भी कुछ पथराई सी है..
एक दर्द है तेरी  उन आखों में,
जैसे तुमने कुछ खो दिया है ||

H/English

Aaj mile hum barson baad,
maano samay ruk sa gaya hai..
na mere paas koi baat hai,
naa tum kuchh bol rahi ho..
main tumhain dekhata hun bas ek tuk..
teri nazar bhi kuchh patharai si hain..
ek dard hai teri un aakhon me,
jaise tumne kuchh kho diya hai ||

Tuesday, 19 April 2011

"समाधि..!!"

इस संसार में आज क्यों है इतना क्लेश
क्यों आदमी, आदमी से कर रहा है द्वेष
क्यों जरूरतें नहीं होती हैं जिंदगी भर पूरी
कुछ भी तो तेरा नहीं है यहाँ पर
उससे जितना लिया है उसे उतना लौटना ही है
फिर क्यों....
आदमी को ज़िन्दगी भर है इतना गुमान ..
एक मुट्ठी राख है शमशान में जलने के बाद
बस मेरी यही आखरी इच्छा है कि
मेरी चिता के सामने एक आईना रखना...
देखूंगा कैसे जलकर राख हो रहा हूँ मैं ...
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(H/English)
Is sansaar me aaj kyun hai itna klesh
kyun aadmi, aadmi se kar raha hai dwesh
kyun jaruraten nahi hoti hai zindgi bhar puri..
kuchh bhi to tera nahi hai yahan par
usse jitna liya hai use utna loutana hi hai
fir kyun....
aadmi ko zindgi bhar hai itna gumaan...
ek mutthhi raakh hai shamshan me jalne ke baad
bas meri yahi aakhri ichchha hai ki...
meri chita ke saamne ek aaina rakhana...
dekhunga kaise jalkar raakh ho raha hun main...
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Sunday, 17 April 2011

"तेरा शहर..!!"



सुबह होते ही तेरे शहर से जाना है मुझको,
आज की रात जरा मुझको मना कर सोना..
अगर हो सके तो लौटा दे मुझको मेरी हंसी..
या सारी रात मुझको रुला के सोना,
दीया याद का कोई बुझ न जाए कहीं..
कोई शमा प्यार की जला कर सोना...
मैं नहीं कहता कि रहो उम्र भर साथ मेरे..
बस आज की रात अपना बना कर सोना..
उम्र भर रहूँगा तेरी धड़कन में...
बस आज की रात तुम सीने से लगा कर सोना ||||
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H/English
subah hote hi tere shahar se jana hai mujhko,
aaj ki raat zaraa mujko manaa kar sona..
agar ho sake to louta de mujhko meri hansi..
ya saari raat mujko rula kar sona,
diya yaad ka koi bujh na jaaye kahin,
koi shamaa pyar ki jalaa kar sona...
main nahi kahata ki raho umar bhar saath mere..
bas aaj ki raat apana banaa kar sona..
umar bhar rahunga teri dhadkan me..
bas aaj ki raat tum sine se lagaa kar sona||||
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Saturday, 9 April 2011

"दुपट्टा..!!"




मुद्दतों बाद तेरा दुपट्टा मेरे सामने आया 
देखा इसे तो वो दिन याद आया...
कितनी जिद्द थी तुम्हें इसे लेने की
बड़े अरमानों से ख़रीदा था तुमने...
तेरी गर्दन की ये शान थी
लपेट कर जब तुम इसे चलती थी....
तेरी मतवाली चाल पर ये लहराती थी 
दूर से ही तुम्हें देखकर 
तेरी खुशबू महसूस हो जाती थी
जब तुम इस दुपट्टे से 
अपनी आखें बंद करके 
चेहरे को ढकती थी  और
दाँतों से जब दुपट्टे को कटती थी 
एक अजब सी  ख़ामोशी 
आस पास छा जाती थी 
और जब तुम अपनी आखें खोलतीं
तो मेरे ऊपर तेरी आखों की 
रेशमी चमक की बारिश होती थी...
मुद्दतों बाद तेरा दुपट्टा मेरे सामने आया 
देखा इसे तो वो दिन याद आया...
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(H/English)
"Dupatta"
Muddaton baad tera dupatta mere saamne aaya
Dekha ise to vo din yaad aaya
Kitni zidd thi tumhain ise lene ki
Bade armaanon se kharida tha tumne...
Teri garden ki ye shaan thi
Lappet kar jab tum ise chalti thi...
Teri matwaali chaal par ye lahraati thi
Dur se hi tumhain dekhkar
Teri khushboo mahsus ho jaati thi
Jab tum is dupatte se
Apni aakhen band karke
Chehre ko dhaktin thi aur
Daaton se jab dupatte ko katati thi
Ek ajab si khamoshi
Aas paas chhaa jaati thi
Aur jab tum apni aakhen kholti thi
To mere upar teri aakhon ki
Reshami chamak ki barish hoti thi...
Muddaton baad tera dupatta mere saamne aaya
Dekha ise to vo din yaad aaya...
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Thursday, 24 March 2011

"विरह..!!"


विरह
आज अमावास के अँधेरे में,
तीन जान तनहा भटक रहे हैं |
मैं यहाँ अकेला तुम्हें सोच रहा हूँ,
तुम वहां अकेली खोयी हो,
और ये रात अकेली रो रही है |

चाँद इस रात से  कुछ यूँ खफा है,
कि चांदनी इसे आज नसीब नहीं |
और समय मुझसे कुछ यूँ खफा है.
कि मेरी चांदनी आज मेरे करीब नहीं |  

बस कुछ और दिनों  की विरह है, 
जब चाँद बिखेरेगा रात पर  चांदनी |
ये अमावास की रात खिलखिला उठेगी,
जब तुम्हें मैं अपनी बाहों में लूँगा,
और कोई दूरी न अपने दरमयां रहेंगी  ||
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(H/English)
Virah
Aaj amawas ki raat me,
Tin jaan tanaha bhatak rahe hain |
main yahan akela tumhain soch raha hun,
Tum wahan akeli khoyi ho,
aur ye raat akeli ro rahi hai |

Chaand is raat se kuch yun khafa hai,
ki chandni ise aaj naseeb nahi hai |
aur samay mujhse kuch yun khafa hai,
ki meri chandni mere kareeb nahi hai |

bas kuch aur dinon ki virah hai,
jab chand bikherega raat par chandni |
ye amawas ki raat khilkhila uthegi,
jab tumhain main apni baahon me lunga,
aur koi doori na apne darmaayan rahengi ||
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...