Thursday, 25 August 2011

"पत्थर की बूत..!!"


हालात देखकर अपने देश की
शर्मिंदा हो जाता हूँ----
धिक्कारती है ज़मीर मेरी, 
क्यों ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ |
एक तरफ है सत्ता की भूख-
और कहीं है पैसे की लूट |
कहा था किसी ने इस देश के लिए--
जय जवान ! जय किसान !
पर किसानों के इस देश में ,
कौन उन्हें अब पूछता है ---
जवानों की तो जाने क्या ....
कितनी बूतें पड़ोस में ही सोते हैं |
इस कलंकित जीवन पर अब....
त्याग और क्रांति का कोई मोल नहीं |
निर्ज़र सी हो गयी है मेरी सभी आशाएं कि....
जय जय कार की ललकार की गूंज- 
भी अब भेद्य नहीं है  कानों को |
लाख बहाने करता हूँ पर....
फ़रिश्ते आते नहीं मौत के, उठाने के लिए ---
बस एक जीवित पत्थर की बूत बन गया हूँ ||
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"वो पगली..!!"


जब देखा एक पगली को तो 
खुद पर रो दिया था मैं
ये जीवन उसके लिए क्या है
न उसका कोई वर्तमान है
ना ही कोई भविष्य है
हाँ उसका एक अतीत जरुर है
जो वो अब शायद उसे याद नहीं
उसके भी कोई घर वाले होंगे
अपने आँगन में उसने भी खेला होगा
मेहंदी लगे उसके हाथों में 
ऐसा सपना उसने भी देखा होगा
आज उसे ना उस आँगन का होश है
ना ही क्यूँ जी रहे हैं इसकी कोई आस है
उसका जीवन भी एक पल में ही बदला होगा
एक पल में ही उसका जीवन कालिख से रंगा होगा
जब उस पगली को देखा तो 
खुद पर रो दिया था मैं
मैंने आईने में खुद को फिर देखा
तो ये ख्याल मेरे अन्दर कौंधा 
ये आइना क्या सही में सच्चाई बतलाता है
हाँ बतलाता तो है
जीवन की वो सच्चाई जो हम भूल जाते हैं
कि एक चोट की देर है ये भी बिखर जायेगा
स भंगुर आईने की तरह....
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