Thursday, 25 August 2011

"पत्थर की बूत..!!"


हालात देखकर अपने देश की
शर्मिंदा हो जाता हूँ----
धिक्कारती है ज़मीर मेरी, 
क्यों ऐसे लोगों से जुड़ा हूँ |
एक तरफ है सत्ता की भूख-
और कहीं है पैसे की लूट |
कहा था किसी ने इस देश के लिए--
जय जवान ! जय किसान !
पर किसानों के इस देश में ,
कौन उन्हें अब पूछता है ---
जवानों की तो जाने क्या ....
कितनी बूतें पड़ोस में ही सोते हैं |
इस कलंकित जीवन पर अब....
त्याग और क्रांति का कोई मोल नहीं |
निर्ज़र सी हो गयी है मेरी सभी आशाएं कि....
जय जय कार की ललकार की गूंज- 
भी अब भेद्य नहीं है  कानों को |
लाख बहाने करता हूँ पर....
फ़रिश्ते आते नहीं मौत के, उठाने के लिए ---
बस एक जीवित पत्थर की बूत बन गया हूँ ||
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