Sunday, 20 July 2014

"ज़िद्द...!!"


एक तुम थे, जो तुम पर ही रह गए...
हम भी कुछ कम नहीं थे 
ज़िद्द तो हमने भी की थी.. 
और हम भी, हम पर ही रह गए ...

अब देखो... ये क्या हुआ 
न तुम हारे..  न मैं हारा... 
पर जीता भी तो कौन 
ये दूरियाँ जीतीं.... 
और इतनी लम्बी जीतीं कि 
अब न  तेरी आवाज़ आती है....
न ही तुम मुझे सुन पाती हो....

रोशनी भी कुछ कम हो रही है 
साये गहरा  रहे हैं 
एक ख़ामोशी चुपके से 
इस अँधियारे ज़िन्दगी में 
छा रही है 

दूरियाँ बढ़तीं जा रही हैं...
फिर भी ज़िद्द है दोनों को अभी भी... 
न तुम , तुम से हट  रहे हो... 
न हम , हम से हट रहे हैं... 
ना जाने ये ज़िद्द क्यों है… 
----------*----------

2 comments:

  1. Bahut khoob suman

    Is jeed me bhi kuch khas hai
    Ik apnapan sa ahshash hai
    Ye jeed to ab yu hi chalti rahegi
    Jab tak ye ahshash baki rahegi

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  2. Wah wah kya bat

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