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Monday, 12 September 2011

"अँधेरी रात..!!"




मैं सोचता हूँ..
 बस रात हो अँधेरी रात
मुझे ले ले अपने नरम बाहों में
मेरी थकी हुई आखों पे उंगलियाँ रख दे
मैं सिर्फ ख्वाब ही देखा करूँ सुन्दर ख्वाब
ना नींद टूटे, ना यादों की चिलमने सरकें
ना कोई ज़ख्म उजाले का मेरे दिल पर लगे
कब से खामोश हूँ, खड़ा हूँ किसी मूर्ति की तरह
मौसम आते हैं मुझे छू कर गुजर जाते हैं
हकीकत से मैं डरता हूँ इसलिए अक्सर
मैं सोचता हूँ बस रात हो ...
अँधेरी रात !!!
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...