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Monday, 3 January 2011

"तन्हाई..!!!"

तन्हाई

चलता था नंगे पैर सागर किनारे, साथ तन्हाई चलती थी
लहरों की आवाज़ सुन तन्हाई भी अंगड़ाई लेती थी
पर सागर की गहराइयों से डर मेरे अन्दर ही रहती थी
मेरा हर वक़्त पीछा करती थी मेरी तन्हाई

फिर क्यों तुमने मेरी तन्हाई को छुआ
अब ये शिकायत करती है मुझसे
तन्हा नहीं रहना अब मेरी तन्हाई को
तेरे साथ कि ये हर वक़्त गुजारिश करती है

तेरा चेहरा इसे अब चाँद नज़र आता है
पास बैठी रहो बस इसे निहारना चाहता है
तुम बिखेर देती हो वो चांदनी कि
मेरी तन्हाई को एक साथी मिल जाता है

कि अक्सर मेरी तन्हाई मुझसे शिकायत करती है
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Monday, 22 November 2010

"आज पूनम की रात आई है..!!"


आज पूनम की रात आई है...
चांदनी की एक लहर ,
झरोखे से घर में घुस आई है |
ऐसा मानो जैसे रात में ,
दूध की नदी बह आई है ||

हवा चली है मद्धम मद्धम,
एक नयी खुशबू सी फ़ैल आई है |
कमरे में एक ताजगी है ,
और स्फूर्ति सी मन में छाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है....

खिड़की से जब बाहर देखूं...
दूर- दूर तक सड़कों पर -
एक वीरानी सी छाई है |
सारी सुन्दरता आज बस ,
उस चाँद में ही समाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है ....
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...