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Friday, 10 December 2010

"बढती ज़िन्दगी ..!!"

कुछ दोस्त थे जो समझते थे,
कुछ दोस्त थे जो समझाते थे |
कुछ थे जिनको कुछ सिखाता था,
कुछ थे जिनसे खुद मैं सीखता था ||

अब रह गयी बाकी कुछ एहसास---
फिर सब कुछ पहले सा कहाँ होता है ....
करता है कुछ सिकवा-शिकायत ये दिल ---
लेकिन, फिर से शामिल दुनिया में होता है ||

ना... थमेगी ये जिंदगी ....
ना यहाँ कुछ रुकता सा दिखता है |
मालूम है तुम संभल जाओगे ....
दर्द तो सिर्फ एक शायर को होता है ||
---------*----------

"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...