घर -- वो मेरा प्यारा घर
जिसे अब शायद भूल रहा हूँ
याद है एक समय था जब
सूरज के ढलते ही घर लौट आता था
कभी रात में बाहर नहीं रुका जाता था
अपने बिस्तर पर ही नींद सुहानी आती थी
ना जाने वो सुख चैन अब कहाँ गया
भूल गया हूँ --
पिछली बार कब लौटा था अपने घर
मेरा घर मुझसे अब दूर हो गया
वो मुझसे शायद कुछ रूठ गया और
अपनी जगह छोड़ कहीं चला गया
बस उस घर की अब याद ही बसी है मन में
घर के नाम पर खाली कमरा है पास में
उसी को सजाते रहता हूँ अपने घर की तरह
किन्तु इसके गुलदस्ते से वो खुशबू नहीं आती
वो अपनापन वो रिश्ता नज़र नहीं आता
जीवन ने अपनी ऐसी करवट बदली
कि हम नींद में अब करवत बदलना छोड़ दिए
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Thursday, 9 September 2010
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