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Sunday, 11 August 2013

"घर बुलाता है...!!!"



तब ...
घर से जब बाहर निकलता था
कब दोपहर हुई ...कब शाम हुई
रात ने कब घेरा पता ही नहीं चलता था
और वापस लौटना ही भूल जाता था
तब ...
माँ की आवाज़ आती ...
बेटा रात बहुत हो गयी .. घर आ जा ..
मानो घर खुद शाम में
मुझे ढूंढ़ कर वापस बुला रहा हो…

अब...
घर से जब बाहर निकलता हूँ ...
दोपहर होती है .. शाम होती है… 
रात की अंधियारी अपने आगोश में लेती है… 
और अक्सर भटक जाता हूँ .... 
क्यूंकि ...
ना अब घर मुझे ढूंढ़ता है ..
और ना ही कोई आवाज़ बुलाती है… 
----------*----------

Thursday, 9 September 2010

"घर..!!"

घर -- वो मेरा प्यारा घर
जिसे अब शायद भूल रहा हूँ
याद है एक समय था जब
सूरज के ढलते ही घर लौट आता था
कभी रात में बाहर नहीं रुका जाता था
अपने बिस्तर पर ही नींद सुहानी आती थी
ना जाने वो सुख चैन अब कहाँ गया
भूल गया हूँ --
पिछली बार कब लौटा था अपने घर
मेरा घर मुझसे अब दूर हो गया
वो मुझसे शायद कुछ रूठ गया और
अपनी जगह छोड़ कहीं चला गया
बस उस घर की अब याद ही बसी है मन में
घर के नाम पर खाली कमरा है पास में
उसी को सजाते रहता हूँ अपने घर की तरह
किन्तु इसके गुलदस्ते से वो खुशबू नहीं आती
वो अपनापन वो रिश्ता नज़र नहीं आता
जीवन ने अपनी ऐसी करवट बदली
कि हम नींद में अब करवत बदलना छोड़ दिए
----------*----------
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...