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Wednesday, 29 September 2010

"इंसानियत..!!"

जाने कहाँ से चले थे हम
आज यहाँ तक आये हैं
मंजिल तो सभी का एक ही है
तो फिर क्यों
एक दुसरे से दौड़ लगाये हैं

बस इस जिंदगी भर का साथ है
ऊपर न भाई है, न कोई बाप है
मिट जाए जो यहाँ से वो आप हैं
पीछे रह जाए जो वो आपकी याद है

आप मानने को जो भी मानो
इश्वर मानो या अल्लाह मानो
ऊपर कौन बैठा है
ना तुम्हें पता, ना हमें पता

जानवर हमें देखते हैं
बस एक आदमजात इंसान की तरह
तो फिर हम क्यों--
एक दुसरे को देखते हैं
हिन्दू की तरह या मुसलमान की तरह

ऐसे धर्म को क्या मानना
जो हिंसा करने को सलाह दे
मानो तो इंसानियत को मानो
जो हर दूरी को मिटा दे
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Thursday, 9 September 2010

"घर..!!"

घर -- वो मेरा प्यारा घर
जिसे अब शायद भूल रहा हूँ
याद है एक समय था जब
सूरज के ढलते ही घर लौट आता था
कभी रात में बाहर नहीं रुका जाता था
अपने बिस्तर पर ही नींद सुहानी आती थी
ना जाने वो सुख चैन अब कहाँ गया
भूल गया हूँ --
पिछली बार कब लौटा था अपने घर
मेरा घर मुझसे अब दूर हो गया
वो मुझसे शायद कुछ रूठ गया और
अपनी जगह छोड़ कहीं चला गया
बस उस घर की अब याद ही बसी है मन में
घर के नाम पर खाली कमरा है पास में
उसी को सजाते रहता हूँ अपने घर की तरह
किन्तु इसके गुलदस्ते से वो खुशबू नहीं आती
वो अपनापन वो रिश्ता नज़र नहीं आता
जीवन ने अपनी ऐसी करवट बदली
कि हम नींद में अब करवत बदलना छोड़ दिए
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...