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Friday, 3 September 2010

"जिंदगी का रंग..!!!

ऐसा कहते हैं, मौत का रंग काला होता है,
तो जिंदगी मुझे क्यों काली दिखती है

मेरा अक्स मुझसे कुछ कहना चाहता है,
हर वक़्त एक दर्द मेरे दिल में होता है

ये जिंदगी अब बोझ सी लगती है,
मौत आ नहीं रही, इसलिए जीता हूँ

ऐसे जीने में कोई संतोष नहीं होता है,
क्यों आयें हैं यहाँ, सोच कर रोता हूँ

क्यों ज़माना इतना मतलबी होता है,
दूसरों के लिए कभी वक़्त नहीं रहता है

जब मैं अपने अन्दर झांकता हूँ,
एक अजीब भयानक मंजर दिखता है

सच है जिंदा हो कर भी मर गया हूँ मैं,
इसलिए ज़िन्दगी का रंग अब काला दिखता है !!

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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...