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Thursday, 18 November 2010

"दूर...!!!"

ये एक साल घर से दूर परिवार से दूर
दोस्तों और सभी रिश्तेदारों से दूर
खुद में खोया, खुद को सोचा
पर न जाने किस उधेड़बुन में फंसा

इस अकेलेपन में मैंने समय को पार होते देखा
हर एक - एक पल मैंने इंतज़ार करके गुजारा
कुछ भी ना कर पाया हांसील इस एक साल में
सिर्फ अपने बढ़ते उम्र के सिवा

कुछ चेहरे मिट गए कुछ सूरतें बनती रहीं..
कुछ को याद बना लिया कुछ हसरतें हो गयी
आज रो रहा हूँ दूर होकर सभी अपनों से
ऐसा लग रहा है मुस्कुराने की सज़ा मिल गयी
----------*----------

"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...