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Wednesday, 8 September 2010

"उसने..!!"

है शुक्र उस मुखड़े का,
जिसकी याद की तपिश से,
इतना निखर गया हूँ मैं !
जिस मुखड़े को देख --
मुस्कुराता था मैं....
नज़रों की एक टक्कर से ही..
सिने में हलचल होती थी !

अब तो उस मुखड़े की याद से ही..
आखें भर आती हैं---
पहले जिसे अपना कहने में ...
कोई संकोच ना था ...
ज़िन्दगी कैसे जियें ---
इसका भी होश ना था...
बस उसके साथ बैठे हुए,
वक़्त गुजर रहा था !

है शुक्र कि उसकी तन्हाई ने...
मुझे जीना सिखा दिया !
अब हर मुखड़े को देख मुस्कुराता हूँ मैं..
कि उसने मुझे अब ---
खुद से प्यार करना सीखा दिया ..!!
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...