Wednesday, 18 August 2010

"गुनहगार..!!"


मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा तो
दिल ने कहा तुम बहुत खुबसूरत हो
पर आज मैंने जाना कि...
तुम्हारे अन्दर एक और तुम है ,
जो तुमसे भी ज्यादा सुन्दर है..
मैं तो मुर्ख था, और शायद...
तुम्हारा गुनहगार भी..--
कभी तुमने---
बिलकुल कोरा काग़ज देखा है ..!
नहीं...-- तो देख लो मुझे ..
मैं भी बिलकुल ख़ाली और बेदाग़ हूँ
जिसमे कोई रंग नहीं, मायने नहीं, मकसद नहीं
दूर से तो एक जलूस सा नज़र आता है
पर नजदीक से देखता हूँ तो --
मुझे अपनी ही अर्थी नज़र आती है..!
जिसे मैं पने ही कंधे पर उठाये --
जाने कहाँ-से-कहाँ लिए जा रहा हूँ..!
सही में अब जाना---
मैं तुम्हारा सबसे बड़ा गुनहगार हूँ...!!!
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