Tuesday, 17 August 2010

"लगन..!!"

मैं ना उनके नाम कि, व्याख्या करूँगा,
ना उनकी प्रशंसा करूँगा, ना तो उन्हें पुकारूँगा,
मैं तो सिर्फ टेर लगाऊंगा, मैं तो सिर्फ आवाज़ दूंगा-
वैसी ही आवाज़--
जैसे रेगिस्तान में भटकता हुआ...--प्यासा आदमी,
पानी कि बूँद को पुकारता है
और वो बूँद उन क्षणों के अन्दर---
उसका खुदा, उसका इश्वर, उसका ब्रह्म बन जाती है !!

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"हक़...!!!"

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