Sunday, 9 January 2011

"बेबसी...!!!"

"बेबसी...!!!"



आज कोरे काजग में क्यों...
अपने जीवन का कोरापन दिखता है |
बैठा था कुछ लिखने फ़साने जीवन के..
क्यों मेरे आंसुओं से ये गिला हो जाता है ||

हसरतें बहुत हैं उमड़ती मेरे अन्दर--
पर हो गया हूँ मैं बेबस इस तरह कि...
इस ठूंठ दुनिया में ------
जिंदगी एक छांव की तालाश करती  है ||

अपनों  ने भी ठुकराया ऐसे कि....
अब किसी पर आस होती नहीं है |
दे दो मुझे सहारा एक  बैसाखी का...
कि मेरे पैर भी अब लाचार दिखते हैं |||
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Wednesday, 5 January 2011

"ज़िन्दगी-- तुझसे आगे...!!!"

"ज़िन्दगी-- तुझसे आगे...!!!"
जीवन के इस आपाधापी में मैं..
कुछ पल चलता, कुछ पल रुकता मगर
इस कुछ- पल में.. ज़िन्दगी मुझसे आगे बढ जाती,
फिर भी, मैं हर पल मुस्कुराता....
ज़िन्दगी मुझपर होकर हैरान
बोली ----
तुम हार रहे हो फिर भी मुस्कुराते हो नादान !!!

मैं अपनी हार पर या किसी के जीत पर हूँ अटल 
अपनी चाल में चलना है मुझे ये जीवन
आज तू ज़िन्दगी जीत जाएगी...
पर एक दिन एक ऐसी सीमा आएगी कि
तू थक कर, एक कदम आगे भी न जा पाएगी
तब भी मैं रहूँगा अचल
मुस्कुराते हुए ही,
ऐ ज़िन्दगी- जाऊँगा तुझसे आगे निकल
और तू करेगी मेरा इंतज़ार
लौट कर मैं न आऊंगा और
उस अलग संसार में भी मैं मुस्कुराऊंगा
फिर निकल जाऊंगा नए एक ऐसे सफ़र पर
जहाँ अनजान रास्ते और अनजान हमसफ़र मेरी राह तकेंगी !!
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Monday, 3 January 2011

"तन्हाई..!!!"

तन्हाई

चलता था नंगे पैर सागर किनारे, साथ तन्हाई चलती थी
लहरों की आवाज़ सुन तन्हाई भी अंगड़ाई लेती थी
पर सागर की गहराइयों से डर मेरे अन्दर ही रहती थी
मेरा हर वक़्त पीछा करती थी मेरी तन्हाई

फिर क्यों तुमने मेरी तन्हाई को छुआ
अब ये शिकायत करती है मुझसे
तन्हा नहीं रहना अब मेरी तन्हाई को
तेरे साथ कि ये हर वक़्त गुजारिश करती है

तेरा चेहरा इसे अब चाँद नज़र आता है
पास बैठी रहो बस इसे निहारना चाहता है
तुम बिखेर देती हो वो चांदनी कि
मेरी तन्हाई को एक साथी मिल जाता है

कि अक्सर मेरी तन्हाई मुझसे शिकायत करती है
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Friday, 10 December 2010

"बढती ज़िन्दगी ..!!"

कुछ दोस्त थे जो समझते थे,
कुछ दोस्त थे जो समझाते थे |
कुछ थे जिनको कुछ सिखाता था,
कुछ थे जिनसे खुद मैं सीखता था ||

अब रह गयी बाकी कुछ एहसास---
फिर सब कुछ पहले सा कहाँ होता है ....
करता है कुछ सिकवा-शिकायत ये दिल ---
लेकिन, फिर से शामिल दुनिया में होता है ||

ना... थमेगी ये जिंदगी ....
ना यहाँ कुछ रुकता सा दिखता है |
मालूम है तुम संभल जाओगे ....
दर्द तो सिर्फ एक शायर को होता है ||
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Tuesday, 23 November 2010

"अच्छे थे हम जब बच्चे थे..!!"

एक एक करके सब अपने छूटे
सारे रिश्ते- नाते और बंधन टूटे
क्या मिला हमें बड़ा होकर
हार कर हम सबसे रूठे

तेरी ख़ुशी में ख़ुशी मनाता था
हमेशा महफिल में शामिल था
क्या थे वो मासूम से रिश्ते
जो हर दर्द मिटा जाते थे

खेले थे हम साथ साथ
साथ में दौड़ लगायी थी
ये कैसा दौड़ाया जीवन ने
कि हम साथ छोड़कर भाग गए

अच्छे थे हम जब बच्चे थे
सच्चे थे वो काम जो होते थे
झूठ - फरेब तो उम्र ने सिखाया
अब लगता है --
अच्छे ही थे जब हम बच्चे थे
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Monday, 22 November 2010

"आज पूनम की रात आई है..!!"


आज पूनम की रात आई है...
चांदनी की एक लहर ,
झरोखे से घर में घुस आई है |
ऐसा मानो जैसे रात में ,
दूध की नदी बह आई है ||

हवा चली है मद्धम मद्धम,
एक नयी खुशबू सी फ़ैल आई है |
कमरे में एक ताजगी है ,
और स्फूर्ति सी मन में छाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है....

खिड़की से जब बाहर देखूं...
दूर- दूर तक सड़कों पर -
एक वीरानी सी छाई है |
सारी सुन्दरता आज बस ,
उस चाँद में ही समाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है ....
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Thursday, 18 November 2010

"दूर...!!!"

ये एक साल घर से दूर परिवार से दूर
दोस्तों और सभी रिश्तेदारों से दूर
खुद में खोया, खुद को सोचा
पर न जाने किस उधेड़बुन में फंसा

इस अकेलेपन में मैंने समय को पार होते देखा
हर एक - एक पल मैंने इंतज़ार करके गुजारा
कुछ भी ना कर पाया हांसील इस एक साल में
सिर्फ अपने बढ़ते उम्र के सिवा

कुछ चेहरे मिट गए कुछ सूरतें बनती रहीं..
कुछ को याद बना लिया कुछ हसरतें हो गयी
आज रो रहा हूँ दूर होकर सभी अपनों से
ऐसा लग रहा है मुस्कुराने की सज़ा मिल गयी
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...