Wednesday, 29 September 2010

"इंसानियत..!!"

जाने कहाँ से चले थे हम
आज यहाँ तक आये हैं
मंजिल तो सभी का एक ही है
तो फिर क्यों
एक दुसरे से दौड़ लगाये हैं

बस इस जिंदगी भर का साथ है
ऊपर न भाई है, न कोई बाप है
मिट जाए जो यहाँ से वो आप हैं
पीछे रह जाए जो वो आपकी याद है

आप मानने को जो भी मानो
इश्वर मानो या अल्लाह मानो
ऊपर कौन बैठा है
ना तुम्हें पता, ना हमें पता

जानवर हमें देखते हैं
बस एक आदमजात इंसान की तरह
तो फिर हम क्यों--
एक दुसरे को देखते हैं
हिन्दू की तरह या मुसलमान की तरह

ऐसे धर्म को क्या मानना
जो हिंसा करने को सलाह दे
मानो तो इंसानियत को मानो
जो हर दूरी को मिटा दे
----------*----------

Saturday, 18 September 2010

"आज फिर..!!"


आज फिर -
मैंने महसूस किया तुम्हें अपने दिल में,
तेरी खुशबू से मन में बहार आई..
तुम्हारी याद ने छुआ मुझे,
और तेरी वो रंगीन गज़ल याद आई !!

आज फिर -
जब अपने अक्स को देखा आईने में,
तो तेरी ही परछाई नज़र आई..
खो जाऊं फिर तुममे ही कहीं मैं,
और तेरी वो चांदनी रात याद आई !!
------------*-------------

Thursday, 16 September 2010

"वक़्त..!!"

एक सबसे बड़ा बहरूपिया देखा मैंने ...
ये चलता रहता है, कभी रुका नहीं अपने जीवन में
न जाने कितने युगों का वो, बस अकेला साक्षी है
वही तो है, जो भूत और भविष्य का ज्ञानी है
बस वही एक शाश्वत सत्य है
किसी के पास रहता है, अभिशाप की तरह और
किसी के पास रहता है, एक वरदान की तरह
कौन है जो इसे पकड़ पाया है..
इसके आगे तो भगवान ने भी शीश झुकाया है
वही है जो सब में चलते रहने की शक्ति देता है
और रिश्तों के हर घाव को भी भर देता है
कभी ये बिताये नहीं बीतता है और
कभी कोई इसका इंतज़ार भी करता है
कभी ये अच्छा होता है कभी ये बुरा होता है
पर सबके पास ये, उसका अपना होता है
ये हर किसी को उसके करनी का फल देता है
हाँ, ये वही है---
जिसे हम वक़्त, तो कोई समय और पल कहता है !!
----------*----------

Thursday, 9 September 2010

"घर..!!"

घर -- वो मेरा प्यारा घर
जिसे अब शायद भूल रहा हूँ
याद है एक समय था जब
सूरज के ढलते ही घर लौट आता था
कभी रात में बाहर नहीं रुका जाता था
अपने बिस्तर पर ही नींद सुहानी आती थी
ना जाने वो सुख चैन अब कहाँ गया
भूल गया हूँ --
पिछली बार कब लौटा था अपने घर
मेरा घर मुझसे अब दूर हो गया
वो मुझसे शायद कुछ रूठ गया और
अपनी जगह छोड़ कहीं चला गया
बस उस घर की अब याद ही बसी है मन में
घर के नाम पर खाली कमरा है पास में
उसी को सजाते रहता हूँ अपने घर की तरह
किन्तु इसके गुलदस्ते से वो खुशबू नहीं आती
वो अपनापन वो रिश्ता नज़र नहीं आता
जीवन ने अपनी ऐसी करवट बदली
कि हम नींद में अब करवत बदलना छोड़ दिए
----------*----------
.

Wednesday, 8 September 2010

"उसने..!!"

है शुक्र उस मुखड़े का,
जिसकी याद की तपिश से,
इतना निखर गया हूँ मैं !
जिस मुखड़े को देख --
मुस्कुराता था मैं....
नज़रों की एक टक्कर से ही..
सिने में हलचल होती थी !

अब तो उस मुखड़े की याद से ही..
आखें भर आती हैं---
पहले जिसे अपना कहने में ...
कोई संकोच ना था ...
ज़िन्दगी कैसे जियें ---
इसका भी होश ना था...
बस उसके साथ बैठे हुए,
वक़्त गुजर रहा था !

है शुक्र कि उसकी तन्हाई ने...
मुझे जीना सिखा दिया !
अब हर मुखड़े को देख मुस्कुराता हूँ मैं..
कि उसने मुझे अब ---
खुद से प्यार करना सीखा दिया ..!!
----------*----------
.

Monday, 6 September 2010

"हिंदी..!!"

माँ को मॅाम, बाबूजी को पॉप बनाया,
और अपने संस्कार ही भूल गए !
पेट को पिज्जा, बुर्गेर और कोला खिलाया,
और अपना स्वादिस्ट भोजन ही भूल गए !

सभी खुद में हैं ऐसे व्यस्त कि ,
हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाना भूल गए !
जींस का ऐसा चला ज़माना कि ,
स्वदेशी होने का एहसास भूल गए !

ये कैसा गुलाम बनाया कि ,
हम अपनी भाषा बोलना भूल गए !
अपने देश में ही ऐसे तिरस्कारा कि ,
हम हिंदी होने का एहसास भूल गए !
----------*----------


"सोचा न था..!!"

तुम अगर मुझे सुन लेती..
तो आज जिंदगी कुछ यूँ तो न होती !
कितने सपने सजाये थे मैंने..
सोचा न था कि जीवन-नैया अकेले चलाएंगे !!

मेरे पहलू में अगर कुछ देर बैठ जाती..
तो आज ये बेचैनी कुछ यूँ तो न होती !
तुम्हारे लिए कुछ चीजें खरीदीं थी मैंने..
सोचा न था की आज वो यूँ बर्बाद हो जायेंगे !!

मेरे साथ कुछ देर तुम चल लेती..
तो आज मंजिल कुछ यूँ तो न होती !
रास्ते तो हसीन बनाये थे मैंने..
सोचा न था कि यूँ हमसफ़र बदल जायेंगे !!
----------*----------

"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...