Tuesday, 23 November 2010

"अच्छे थे हम जब बच्चे थे..!!"

एक एक करके सब अपने छूटे
सारे रिश्ते- नाते और बंधन टूटे
क्या मिला हमें बड़ा होकर
हार कर हम सबसे रूठे

तेरी ख़ुशी में ख़ुशी मनाता था
हमेशा महफिल में शामिल था
क्या थे वो मासूम से रिश्ते
जो हर दर्द मिटा जाते थे

खेले थे हम साथ साथ
साथ में दौड़ लगायी थी
ये कैसा दौड़ाया जीवन ने
कि हम साथ छोड़कर भाग गए

अच्छे थे हम जब बच्चे थे
सच्चे थे वो काम जो होते थे
झूठ - फरेब तो उम्र ने सिखाया
अब लगता है --
अच्छे ही थे जब हम बच्चे थे
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Monday, 22 November 2010

"आज पूनम की रात आई है..!!"


आज पूनम की रात आई है...
चांदनी की एक लहर ,
झरोखे से घर में घुस आई है |
ऐसा मानो जैसे रात में ,
दूध की नदी बह आई है ||

हवा चली है मद्धम मद्धम,
एक नयी खुशबू सी फ़ैल आई है |
कमरे में एक ताजगी है ,
और स्फूर्ति सी मन में छाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है....

खिड़की से जब बाहर देखूं...
दूर- दूर तक सड़कों पर -
एक वीरानी सी छाई है |
सारी सुन्दरता आज बस ,
उस चाँद में ही समाई है ||
कि आज पूनम कि रात आई है ....
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Thursday, 18 November 2010

"दूर...!!!"

ये एक साल घर से दूर परिवार से दूर
दोस्तों और सभी रिश्तेदारों से दूर
खुद में खोया, खुद को सोचा
पर न जाने किस उधेड़बुन में फंसा

इस अकेलेपन में मैंने समय को पार होते देखा
हर एक - एक पल मैंने इंतज़ार करके गुजारा
कुछ भी ना कर पाया हांसील इस एक साल में
सिर्फ अपने बढ़ते उम्र के सिवा

कुछ चेहरे मिट गए कुछ सूरतें बनती रहीं..
कुछ को याद बना लिया कुछ हसरतें हो गयी
आज रो रहा हूँ दूर होकर सभी अपनों से
ऐसा लग रहा है मुस्कुराने की सज़ा मिल गयी
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Wednesday, 29 September 2010

"इंसानियत..!!"

जाने कहाँ से चले थे हम
आज यहाँ तक आये हैं
मंजिल तो सभी का एक ही है
तो फिर क्यों
एक दुसरे से दौड़ लगाये हैं

बस इस जिंदगी भर का साथ है
ऊपर न भाई है, न कोई बाप है
मिट जाए जो यहाँ से वो आप हैं
पीछे रह जाए जो वो आपकी याद है

आप मानने को जो भी मानो
इश्वर मानो या अल्लाह मानो
ऊपर कौन बैठा है
ना तुम्हें पता, ना हमें पता

जानवर हमें देखते हैं
बस एक आदमजात इंसान की तरह
तो फिर हम क्यों--
एक दुसरे को देखते हैं
हिन्दू की तरह या मुसलमान की तरह

ऐसे धर्म को क्या मानना
जो हिंसा करने को सलाह दे
मानो तो इंसानियत को मानो
जो हर दूरी को मिटा दे
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Saturday, 18 September 2010

"आज फिर..!!"


आज फिर -
मैंने महसूस किया तुम्हें अपने दिल में,
तेरी खुशबू से मन में बहार आई..
तुम्हारी याद ने छुआ मुझे,
और तेरी वो रंगीन गज़ल याद आई !!

आज फिर -
जब अपने अक्स को देखा आईने में,
तो तेरी ही परछाई नज़र आई..
खो जाऊं फिर तुममे ही कहीं मैं,
और तेरी वो चांदनी रात याद आई !!
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Thursday, 16 September 2010

"वक़्त..!!"

एक सबसे बड़ा बहरूपिया देखा मैंने ...
ये चलता रहता है, कभी रुका नहीं अपने जीवन में
न जाने कितने युगों का वो, बस अकेला साक्षी है
वही तो है, जो भूत और भविष्य का ज्ञानी है
बस वही एक शाश्वत सत्य है
किसी के पास रहता है, अभिशाप की तरह और
किसी के पास रहता है, एक वरदान की तरह
कौन है जो इसे पकड़ पाया है..
इसके आगे तो भगवान ने भी शीश झुकाया है
वही है जो सब में चलते रहने की शक्ति देता है
और रिश्तों के हर घाव को भी भर देता है
कभी ये बिताये नहीं बीतता है और
कभी कोई इसका इंतज़ार भी करता है
कभी ये अच्छा होता है कभी ये बुरा होता है
पर सबके पास ये, उसका अपना होता है
ये हर किसी को उसके करनी का फल देता है
हाँ, ये वही है---
जिसे हम वक़्त, तो कोई समय और पल कहता है !!
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Thursday, 9 September 2010

"घर..!!"

घर -- वो मेरा प्यारा घर
जिसे अब शायद भूल रहा हूँ
याद है एक समय था जब
सूरज के ढलते ही घर लौट आता था
कभी रात में बाहर नहीं रुका जाता था
अपने बिस्तर पर ही नींद सुहानी आती थी
ना जाने वो सुख चैन अब कहाँ गया
भूल गया हूँ --
पिछली बार कब लौटा था अपने घर
मेरा घर मुझसे अब दूर हो गया
वो मुझसे शायद कुछ रूठ गया और
अपनी जगह छोड़ कहीं चला गया
बस उस घर की अब याद ही बसी है मन में
घर के नाम पर खाली कमरा है पास में
उसी को सजाते रहता हूँ अपने घर की तरह
किन्तु इसके गुलदस्ते से वो खुशबू नहीं आती
वो अपनापन वो रिश्ता नज़र नहीं आता
जीवन ने अपनी ऐसी करवट बदली
कि हम नींद में अब करवत बदलना छोड़ दिए
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"हक़...!!!"

 तुम जो अगर, मुझ पर प्यार से.... अपना एक हक़ जता दो  तो शायरी में जो मोहब्बत है,  उसे ज़िंदा कर दूँ....  हम तो तेरी याद में ही जी लेंगे ... तु...